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कौनसी है ये बॉलीवुड की मशहूर फिल्म जिसका नाम 23 मिनट की स्टोरी के बाद दिखाया गया था ?




TAGS: Amar Akbar Anthony, Manmohan Desai
आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे है जहाँ पर चीजे पालक झपकते ही बदल जाती है या यूँ कहें कि बहुत तेजी से परिवर्तित होती है। आज शार्ट फिल्म्स बन रही है वो भी पांच पांच मिनट की लेकिन यदि हम थोड़ा सा पीछे मुड़र देखने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि फिल्मो की दुनिया में कुछ ऐसे भी रिकॉर्ड दर्ज है जिन्हे सुनकर यकीन कर पाना बहुत मुश्किल है। ऐसा ही एक रिकॉर्ड दर्ज है मूवी स्टार्ट होने के बाद 23 मिनट के पश्च्यात टाइटल का स्क्रीन पर दिखाई देना। जी हाँ सन 1977 में रिलीज हुई डायरेक्टर मनमोहन देसाई की फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' का यह अलबेला रिकॉर्ड काफी चकित कर देने वाला है। 

बॉलीवुड फिल्म्स में जनरली किसी मूवी का टाइटल इतनी अधिक देर के बाद में नहीं आता है। बात यदि फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' के बारे में की जाए तो टाइटल के आने से पहले लगभग 23 मिनट में डायरेक्टर द्वारा मूवी की स्टोरी को सेट करते हुए ऑडियंस को फिल्म के तीनो करैक्टर अमर, अकबर और एंथोनी की चाइल्डहुड स्टोरी दिखाते हैं। किस प्रकार ये तीनो एक ही माता-पिता (निरुपा रॉय - प्राण) के बच्चे होने के बावजूद एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। इस फिल्म की असली स्टोरी स्टार्ट होती है जब रॉबर्ट यानि (जीवन) के लिए ड्राइवरी करने वाले और उसके क्राइम के लिए खुद आत्मसमर्पण करने वाला किशन लाल (प्राण) जेल से वापस घर पहुँचता है। 

घर पहुंचने पर किशन लाल दंग रह जाता है जब उसको मालूम पड़ता है कि उसकी वाइफ भारती (निरुपा रॉय) टीबी की मरीज  है। तथा उसके तीन बच्चे दो दिन से बिना भोजन के भूखे है क्योंकि उसके जेल चले जाने के बाद किशन लाल के साथ किये वादे के अनुसार राबर्ट ने उसके घरवालों को कभी भी पैसे नहीं भिजवाये है। सारी बात जानकर किशन लाल गुस्से से भर जाता है और रॉबर्ट के बंगले पर जाकर उस पर गोली चला देता है, लेकिन राबर्ट बच जाता है क्योंकि उसने बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखी थी। 

जिसके बाद किशन लाल वहां से भागकर पहले सीधा घर वापस आता है और तीनो बच्चों को कार में अपने साथ लेकर निकलता है। रॉबर्ट के गुंडे किशन लाल का पीछा करते हैं, वहां से बच्चो को बचाने के लिए महात्मा गाँधी की एक मूर्ति के पीछे बगीचे में तीनों बच्चों को छोड़कर किशनलाल कार में भागता है। अमर अपने पिता के पीछे पीछे दौड़ता है और रास्ते पर ही गिर कर बेहोश हो जाता है साथ ही बाकी दोनों बच्चे भी अलग अलग हो जाते हैं। वही, रस्ते पर अपने पति-बच्चों को खोजती  भारती का भी एक कार से टकराकर एक्सीडेंट हो जाता है। जिसमे भारती की दोनों ही आँखें ख़राब हो जाती है।

लेकिन फिर टाइम बहुत तेजी से चेंज होता है किशनलाल और भारती के तीनों ही बच्चे अब बड़े हो चुके है और अमर (विनोद खन्ना), अकबर (ऋषि कपूर), एंथोनी (अमिताभ बच्चन) के तौर पर अब ऑडियंस के सामने आते हैं। अचानक एंथोनी को  एक ओल्ड लेडी (भारती) दिखाई देती है जिसकी एक कार से टक्कर हो गयी है और वह रास्ते पर ही बेहोश गिरी पड़ी है। यह देखकर वह भारती को हॉस्पिटल लेकर जाता है। जहाँ पर पुलिस स्टेशन से उस समय अमर भी आया हुआ होता है और अकबर भी हॉस्पिटल में डॉक्टर सलमा अली (नीतू सिंह) को अपने कव्वाली शो के लिए इन्वाइट करने आया है। काफी सीरियसली इन्जर्ड भारती को इलाज के लिए ब्लड की आवश्यकता होती है।

फिल्म के इस मोड़ को डायरेक्टर मनमोहन देसाई ने बेहतरीन तरीके से उपयोग करते हुए एक इमोशनल सीन क्रिएट किया है जिसमें एक दूसरे से अनजान भारती के तीनो बेटे अमर-अकबर-एंथोनी बेड पर लेटकर, सामने बिस्तर पर बेहोश लेती हुई अपनी माँ भारती को खून दे रहे है। एक डॉक्टर द्वारा जब उनका नाम पूछा जाता है तो बारी बारी से तीनों अपना नाम बताते हैं और तब स्क्रीन पर लिखा आता है, 'अमर अकबर एंथोनी' और इस समय तक फिल्म की 23 मिनट की कहानी पूरी हो चुकी होती है। बॉलीवुड की किसी भी अन्य फिल्म में शायद ही इतनी लेट फिल्म का टाइटल डिस्प्ले किया गया होगा। 







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