सम्भल कर किया करो लोगो से बुराई 'मेरी'
तुम्हारे तमाम अपने ...मेरे ही मुरीद हैं!





कभी मुखातिब हो तो कहूं क्या मर्ज है मेरा ,
अब तुम दूर से पूछोगे तो खैरियत हीं कहेंगे ।





कल न हम होंगे न गिला होगा।
     
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिललिसा होगा।

जो लम्हे हैं चलो हंसकर बिता लें।
    
जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा।





क्या बेचकर हम खरीदे "फुर्सत ऐ "जिंदगी 

सब कुछ तो "गिरवी"पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में





माना कि बरगद और पीपल जैसे विशाल हम नही... 

पर गमलों मे उगने वाली तुलसी भी किसी से कम नहीं!!





इतना भी आसान नहीं होता अपने ढंग से ज़िंदगी जी पाना...

बहुतों को खटकने लगते हैं, जब हम खुद को जीने लगते हैं...




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