प्रेम और शादी

एक बार एक युवक ने अपने दादाजी से पूछा, “ऐसा क्यों होता है कि इंसान प्यार तो किसी और से करता है, लेकिन शादी किसी और से?”

प्रश्न सुनकर दादाजी बोले, “बेटा, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं तुम्हें एक काम सौंपता हूँ. गेहूँ के खेत में जाओ और सबसे अच्छी गेंहूँ की बाली चुनकर मेरे लिए लेकर आओ. लेकिन शर्त यह है कि उस गेंहूँ की बाली का चुनाव तुम्हें एक बार देखकर ही करना होगा. अगर एक बार तुम उसे छोड़कर आगे बढ़ गए, तो फिर वापस लौटकर उस बाली को नहीं चुन सकते.”

युवक गेंहूँ के खेत में चला गया. वहाँ वह गेंहूँ की बालियों का मुआयना करने लगा. कई बालियाँ देखने के बाद उसे एक बहुत ही अच्छी गेंहूँ की बाली दिखाई पड़ी. वह उसे तोड़ने को हुआ, लेकिन तभी उसके मन में विचार आया कि हो सकता है आगे बढ़ने पर उसे इससे भी अच्छी बाली मिल जाये. इसलिए वह उसे बिना तोड़े आगे बढ़ गया. कुछ दूर आगे जाने पर उसे एक और अच्छी गेहूँ की बाली दिखाई पड़ी. लेकिन पुनः उसके मन में वही विचार आया कि शायद आगे उसे इससे भी अच्छी गेंहूँ की बालियाँ मिल जाये और वह फिर से आगे बढ़ गया.

इस तरह पूरे खेत का भ्रमण कर लेने के बाद भी वह एक भी गेंहूँ की बाली नहीं तोड़ पाया. खेत के अंतिम छोर में पहुँचने पर उसे समझ आया कि जो बालियाँ उसे पहले दिखाई पड़ी थी, वे बेहतर थी. लेकिन शर्त अनुसार अब वह वापस नहीं जा सकता था. अतः वह खाली हाथ ही अपने दादाजी के पास वापस आ गया. पूछने पर उसने सारा वृतांत सुना दिया.

दादाजी बोले, “बेटा, जैसी गलती तुमने अभी कुछ देर पहले गेंहूँ के खेत में की, वही गलती प्रेम में पड़ने वाले लोग वास्तविक जीवन में करते हैं. वे और बेहतर की तलाश में उस इंसान को खो देते हैं, जो उनका बेहतरीन साथी हो सकता था.”

“तो क्या इसका अर्थ है कि किसी को प्रेम में पड़ना ही नहीं चाहिए?” युवक ने पूछा.

दादाजी ने उत्तर दिया, “नहीं, ऐसा नहीं है. कोई भी प्रेम में पड़ सकता है, यदि कोई योग्य व्यक्ति मिल जाये तो. लेकिन जब भी किसी से सच्चे मन से प्रेम करो, तो उसे कभी भी गुस्से, अहंकार और किसी अन्य से तुलना के कारण मत छोड़ो.”

“पर ऐसा क्यों होता है दादाजी कि इंसान जिससे प्रेम करता है उसे छोड़कर दूसरे से शादी कर लेता है.”

यह प्रश्न सुनकर दादाजी बोले, “इस उत्तर को देने के पहले मैं फिर से तुम्हें एक कार्य सौंपता हूँ. अब तुम एक मक्के के खेत में जाओ और सबसे बड़ा मक्का चुनकर मेरे लिए लेकर आओ. लेकिन इसमें भी शर्त पहले जैसी ही है. मक्के का चुनाव तुम्हें एक बार देखकर ही करना होगा. अगर एक बार तुम उसे छोड़कर आगे बढ़ गए, तो फिर वापस लौटकर उस मक्के को नहीं चुन सकते.”

युवक मक्के के खेत में चला गया. किंतु इस बार वह सावधान था. उसने वह पहली वाली गलती नहीं दोहराई और खेत के बीच पहुँचकर एक मध्यम आकर का मक्का तोड़कर वापस आ गया. वापस आकर उसने दादाजी को बताया कि उसने उस मक्के का चुनाव कैसे किया.

दादाजी बोले, “अपने पुराने अनुभव के कारण तुम इस बार खाली हाथ नहीं लौटे. तुमने बस एक ठीक-ठाक मक्का खोजा और यकीन कर लिया कि यही सबसे अच्छा है. वास्तविक जीवन में भी लोग इसी तरह अपने पुराने अनुभव से सीख लेकर अपनी शादी के लिए चुनाव करते है.”

दादाजी की बात सुनकर युवक दुविधा में पड़ गया. उसे दुविधा में देख दादाजी ने  पूछा, “अब तुम्हें कौन सी बात परेशान कर रही है?’

 “दादाजी आपकी बात सुनने के बाद मैं सोच रहा हूँ कि क्या बेहतर है जिससे प्यार करते हैं, उससे शादी करना या जिससे शादी की है, उससे प्यार करना?”

“बेटा, ये तो तुम पर निर्भर करता है….” दादाजी ने उत्तर दिया.

दोस्तों, जीवन में हम जो भी चुनते हैं, उसके साथ हम खुश रहते हैं या नहीं, ये पूर्णतः हम पर निर्भर करता है. इसलिए चुनाव हमें सोच-समझकर करना होगा. अन्यथा हम जीवन भर ये सोचकर पछताते रहेंगे कि काश मैंने कुछ और चुना होता? लेकिन यह भी सच है कि जब तक हम खुद में सच्चे और ईमानदार रहेंगे, हम किसी भी चुनाव में गलत नहीं हो सकते.




क्या आप कभी मेरी वजह से वो रोये हैं

एक दिन एक लड़की ने अपने पिता से पूछा, “पापा! क्या आप कभी मेरी वजह से वो रोये हैं?” उसके ऐसा पूछने का कारण ये था कि उसने कभी भी अपने पिता को रोते हुए नहीं देखा था.

इस सवाल के जवाब में पिता ने कहा, “हाँ, एक बार ऐसा कुछ हुआ था, जब तुम्हारी वज़ह से मैं रोया था.”

यह सुनकर लड़की उस बात को जानने के लिए उत्सुक हो गई कि आखिर वह क्या बात थी, जिसने उसके पिता को रुला दिया था.

इस उत्सुकतता को शांत करने के लिए पिता वह किस्सा सुनाने लगा –

“बात उस समय है, जब तुम ८ माह की थी. एक दिन मैंने तुम्हारे सामने तीन चीज़ें रखी – एक पेन, एक सिक्का और एक खिलौना. मैं ये जानना चाहता था कि तुम उन चीजों में से क्या उठाओगी. उनमें पेन बुद्धिमत्ता का प्रतीक था, सिक्का धन का और खिलौना मनोरंजन का प्रतीक था.

मैं ये सब बस एक जियासा के कारण कर रहा था. मेरे लिए ये जानना बहुत रोचक था कि मेरी बेटी के लिए आगे जाकर क्या सबसे अधिक मायने रखेगा? मैं तुम्हारे सामने बैठकर बेसब्री से तुम्हारे अगले कदम का इंतजार कर रहा था.

मैंने देखा कि कुछ देर बैठकर तुम उन चीज़ों को देखती रही. फिर घुटने के बल पर चलते हुए उनकी ओर बढ़ी. जब मैंने तुम्हें आगे बढ़ते हुए देखा, तो मेरी धड़कने मानो सी रुक गई.

लेकिन अगले ही पल तुमने उन सभी चीज़ों को अपने हाथ से एक तरफ हटा दिया और आगे बढ़कर मेरी गोद में चली आई. बस यही वो पल था, जब मेरा दिल भर आया था और तुम्हारी वज़ह से मैं रो पड़ा था.”




समय ही प्रेम का मूल्य समझ सकता है

एक टापू था, जहाँ सारी भावनायें (Feelings) रहा करती थी. एक दिन सभी भावनाओं को पता चला कि वह टापू डूबने वाला है. सबने अपने बचाव के लिए नांव का निर्माण किया और वह टापू छोड़कर जाने लगे. लेकिन ‘प्रेम’ वहीं रहा.

‘प्रेम’ आखिरी संभव क्षण तक उस टापू में  रुका रहा. लेकिन जब उसे लगने लगा कि अब टापू पूरी तरह से डूबने के कगार पर है और अब वहाँ रुकने का कोई औचित्य नहीं है. तो वह वहाँ से निकलने के लिए सहायता खोजने लगा.

उसी समय उसकी दृष्टि ‘समृद्धि’ पर पड़ी, जो एक बड़ी नांव में वहाँ से गुजर रही थी. प्रेम ने उसे पुकारा और पूछा, “समृद्धि! क्या तुम मुझे अपने साथ अपनी नांव में ले चलोगी?

‘समृद्धि’ ने उत्तर दिया, “नहीं प्रेम! मैं तुम्हें अपनी नांव में नहीं ले जा सकती. देखो, मेरी नांव में कितना सोना और चांदी भरा हुआ है. किसी और के लिए तो इसमें जगह ही नहीं बची है.” कहकर वह आगे बढ़ गई.

कुछ देर बाद ‘प्रेम’ को ‘दंभ’ अपनी बहुत ही सुंदर नांव में वहाँ से गुजरती हुई दिखाई पड़ी. उसने उसे रोककर अनुनय भरे शब्दों में कहा, “दंभ! कृपा करके मुझे अपने साथ ले चलो.”

उसकी बात सुन ‘दंभ’ तपाक से बोली, “अरे नहीं! तुम तो पूरे भीग चुके हो. तुम्हारे मेरी नांव में आने से मेरी सुंदर नांव ख़राब हो जायेगी.” फिर वह अपनी आँखें फेरकर आगे बढ़ गई.

‘उदासी’ भी निकट ही थी. ‘प्रेम’ ने उससे पूछा तो उसे उत्तर मिला, “ओह प्रेम! मैं बहुत उदास हूँ और इस समय अकेले रहना चाहती हूँ.”

ठीक उसी समय ‘खुशी’ भी वहाँ से गुजर रही थी, लेकिन वह इतनी खुश थी कि उसने ‘प्रेम’ की पुकार सुनी ही नहीं और आगे निकल गई.

अब ‘प्रेम’ को लगने लगा कि वह इस द्वीप के साथ ही डूब जायेगा और वह अपने अंतिम क्षण की प्रतीक्षा करने लगा. तभी एक गंभीर स्वर उसके कानों में पड़ा, ‘आओ प्रेम! मेरे साथ आओ. मैं तुम्हें ले चलता हूँ.’

यह सुनकर ‘प्रेम’ ख़ुशी-खुशी उस नांव में बैठ गया. उसने ये तक नहीं पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं और उसे ले जाने वाला कौन है?

सूखी धरती पर पहुँचने के बाद उस गंभीर आवाज़ ने ‘प्रेम’ को वहाँ छोड़ दिया और अपने रास्ते पर चला गया.

कुछ देर राहत की साँस लेने के बाद ‘प्रेम’ को ये अहसास हुआ कि जिसकी सहायता से उसकी जान बच पाई है, उसके बारे में उसे ये तक पता नहीं कि वह कौन है? वह ‘ज्ञान’ के पास गया और उसने पूछा कि उसे बचाने वाला कौन था.

‘ज्ञान’ ने उसे बताया कि वह ‘समय’ था.

“समय?’ भला उसने मुझे क्यों बचाया?” प्रेम ने हैरत में पूछा.

ज्ञान मुस्कुराया और बोला, ”क्योंकि समय ही प्रेम का मूल्य समझ सकता है.”




एक सैनिक की कहानी

ये कहानी एक सैनिक की है, जो वियतनाम में युद्ध के लिए गया था. युद्ध समाप्त होने के बाद जब उसके घर लौटने की बारी आई, तो उसने अपने माता-पिता को सैन फ्रांसिस्को से फ़ोन किया, “माँ और पिताजी! मैं घर आ रहा हूँ. लेकिन घर आने से पहले मुझे आपसे एक बात पूछनी है. मेरा एक दोस्त है, जिसे मैं अपने साथ घर लाना चाहता हूँ. क्या मैं उसे ला सकता हूँ?”

“बिल्कुल बेटा, ये भी कोई पूछने की बात है. हमें तुम्हारे दोस्त से मिलकर बहुत ख़ुशी होगी.” माता–पिता ने जवाब दिया.

“लेकिन पहले एक बात आप लोग जान लें.” सैनिक बोलता गया, “युद्ध में वह बहुत बुरी तरह घायल हो गया है. उसने एक बारूदी सुरंग पर पैर रख दिया था और उसमें उसने अपना एक हाथ और पैर गँवा दिया है. उसके पास कोई जगह नहीं है, जहाँ वो जा सके, इसलिये मैं उसे अपने साथ रहने के लिए लाना चाहता हूँ.”

उसकी यह बात सुनकर उसकी माँ बोली, “बेटा! तुम्हारे दोस्त के बारे में जानकर हमें बहुत दुःख हुआ. हो सकता है, हम उसके रहने के लिये कोई जगह तलाश कर सकें.”

“नहीं माँ! मैं चाहता हूँ कि वो हमारे साथ रहे.”

“लेकिन बेटा!” अब पिता ने कहा, “तुम समझ नहीं रहे हो कि तुम क्या चाह रहे हो? इस तरह का अपाहिज व्यक्ति हमारे लिए कितना बड़ा बोझ होगा. हमारी अपनी ज़िंदगी है, जीने के लिए और हम नहीं चाहते कि इस तरह की कोई भी परिस्थिति हमारी ज़िंदगी में दखल दे. मेरे हिसाब से तुम्हें अकेले घर आना चाहिए और अपने दोस्त को वहीँ छोड़ देना चाहिए. वह अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगा.”

सुनकर उस सैनिक ने फ़ोन रख दिया. कुछ दिनों बाद, उसके माता-पिता को सैन फ्रांसिस्को पुलिस से एक संदेश मिला. जिसमें उन्हें बताया गया कि उनके बेटे की एक बिल्डिंग से गिरकर मौत हो गई है. पुलिस के हिसाब से ये एक सुसाइड केस था.

दु:खी माता-पिता ने तुरंत ही सैन फ्रांसिस्को के लिए फ्लाइट बुक कराई और वहां पहुँच गए. वहाँ उन्हें शहर के मुर्दाघर ले जाया गया, ताकि वे अपने बेटे की पहचान कर सकें. उन्होंने उसकी पहचान कर ली, किंतु ये देखकर उनकी कंपकंपी छूट गई कि उनके बेटे का बस एक हाथ और एक पैर था.





कौन कहता कि….
बचपन वापस नहीं आता…….

दो घड़ी
माँ के पास तो बैठ कर देखो…,





जरुरी तो नहीं हर चाहत का मतलब इश्क हो 
कभी कभी कुछ अनजान रिश्तों के लिए भी दिल बेचैन हो
 जाता है..!!




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