घृणा और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू ह

एक फकीर एक गांव में आया। गांव के लोग उसके बड़े विरोध में थे। उन्होंने क्रोध में आकर उसको जूतों की माला पहना दी। वह फकीर खूब खिलखिला कर हंसने लगा।

उसने जूते बड़े गौर से देखे। संभाल कर माला रख ली। छाती से लगा ली। गांव के लोगों ने कहा : तुम कर क्या रहे हो, ये जूते हैं! फकीर ने कहा : जूते मेरे फट भी गए थे। और प्रार्थना लगता है, सुन ली। कल ही रात मैंने परमात्मा से कहा था कि जूते दिलवाओ। मगर यह नहीं सोचा था कि इतने दिलवा देगा। मैं तो दो की आशा रखता था। वह भी कभी-कभार सुनता है मेरी प्रार्थना। पक्का भी नहीं था कि सुनेगा, मगर सुबह ही इतने जूते! हे मालिक! तेरी बड़ी कृपा है!

रही आप लोगों की बात। तो यह जानकर मैं खुश हूं कि जो आपके पास था, आप लाए तो! कुछ गांव तो ऐसे हैं कि लोग कुछ भी नहीं लाते--जूते तक नहीं लाते। उनके पास, ऐसा लगता है, कुछ भी नहीं है। फिर जो जिसके पास है . . .। मालियों के गांव में जाता हूं तो फूल लाते हैं। लगता है यह बस्ती चमारों की होगी। जाहिर है जूतों की माला से कि बस्ती चमारों की होगी। चमार भाई! तुम्हारी बड़ी कृपा ! जो जिसके पास है वही देगा न! चमार भाई! तुम्हारी बड़ी कृपा!

जहर कोई लौटाता है, लौटाने दो। जहर लौटाते-लौटाते कभी तो संभलेगा, कभी तो खयाल आएगा। गालियां देते-देते, कभी तो होश आएगा। कभी तो क्षणभर को रुकेगा।
और फिर एक बात और खयाल रखना : जो लोग गालियां देते हैं और जहर फेंकते हैं, इतना तो पक्का है कि मुझसे उनका संबंध हो गया। मेरे संबंध में सोचते हैं, विचार करते हैं। नाता तो जुड़ ही गया। दुश्मनी भी एक नाता है। जैसे दोस्ती एक नाता है। दोस्त की भी याद आती है, दुश्मन की भी याद आती है।

अगर उन्होंने मुझे अपना दुश्मन भी समझ लिया है तो अपने व्‍यक्‍ति में मेरे लिए थोड़ी जगह तो दे ही दी। वहीं से काम शुरू होगा। उतनी जगह भी काफी है। ज़रा-सा पैर रखने को जगह भर मिल जाए, फिर धीरे-धीरे अंगूठा हाथ में आ गया, तो पहुंचा भी हाथ में आ ही जाएगा।

और जो घृणा से भरे हैं, वे कभी भी प्रेम से भर जाएंगे। क्योंकि घृणा और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

असल में वे नाराज ही इसलिए हैं कि उन्हें भय पैदा हो गया है कि अगर वे नाराज न होंगे तो मुझसे राजी हो जाने का डर है। इसलिए मैं फिर दोहरा दूं: तुम नाराज ही तब होते हो किसी से जब तुम्हें राजी होने का डर पैदा हो जाता है। तुम अपने भय में नाराज हो जाते हो। तुम अपनी सुरक्षा करने लगते हो।




जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा

एक संत ने विश्व-विद्यालय आरंभ किया। इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।
एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसका विषय था – “जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।”

निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई। किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों। वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए। आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।

यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे। संत सबको शांत कराते हुए बोले,’प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था।

दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवा भाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था। आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा।
यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया। सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।
जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।




कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के

एक ब्राम्हण था, कृष्ण के 
मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था।

उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता।

भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता।

एक दिन घर में लड्डू बने। 
ब्राम्हण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। 
पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। 
अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं। 
बस ब्राम्हण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। 
मंदिर में जाकर धूनि लगा ली। 
भगवान के सामने लड्डू रखकर
विनती करने लगा। 
एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न ब्राम्हण हटा।
आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई
सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है।
मक्खियां भिनभिनाने लगी ब्राम्हण उन्हें उड़ाता रहा। 
मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं। 
ब्राम्हण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे। 
ब्राम्हण ने उनको भी खदेड़ा। 
लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। 
एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। 
दिन ढल गया, शाम हो गई। 
न भगवान आए, न ब्राम्हण उठा। 
शाम से रात हो गई।
लोगों ने सोचा ब्राम्हण देवता पागल हो गए हैं, 
भगवान तो आने से रहे। 
धीरे-धीरे सब घर चले गए। 
ब्राम्हण को भी गुस्सा आ गया।
लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। 
भिखारी, कुत्ते,चीटी, मक्खी तो दिन भर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े।

उदास ब्राम्हण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। 
इतने सालों की सेवा बेकार चली गई। कोई फल नहीं मिला। 
ब्राम्हण पत्नी के ताने सुनकर सो गया

रात को सपने में भगवान आए। 
बोले-तेरे लड्डू खाए थे मैंने। 
बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह 
ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता

कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए।
मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी। 
पर तुने हाथ नहीं धरने दिया। 
दिनभर इंतजार करना पड़ा।
आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी। 
अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना 
भगवान चले गए।

ब्राम्हण की नींद खुल गई। 
उसे एहसास हो गया। 
भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया।

बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।




प्रेम की हिचकियां

वृन्दावन में बिहारी जी की अनन्य भक्त थी । नाम था कांता बाई...

बिहारी जी को अपना लाला कहा करती थी उन्हें लाड दुलार से रखा करती और दिन रात उनकी सेवा में लीन रहती थी। क्या मजाल कि उनके लल्ला को जरा भी तकलीफ हो जाए।

एक दिन की बात है कांता बाई अपने लल्ला को विश्राम करवा कर खुद भी तनिक देर विश्राम करने लगी तभी उसे जोर से हिचकिया आने लगी...

और वो इतनी बेचैन हो गयी कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। तभी कांता बाई कि पुत्री उसके घर पे आई, जिसका विवाह पास ही के गाँव में किया हुआ था तब कांता बाई की हिचकियां रुक गयी।

अच्छा महसूस करने लग गयी तो उसने अपनी पुत्री को सारा वृत्तांत सुनाया कि कैसे वो हिचकियो में बेचैन हो गयी।

तब पुत्री ने कहा कि माँ मैं तुम्हे सच्चे मन से याद कर रही थी उसी के कारण तुम्हे हिचकियां आ रही थीं और अब जब मैं आ गयी हूँ तो तुम्हारी हिचकिया भी बंद हो चुकी हैं।

कांता बाई हैरान रह गयी कि ऐसा भी भला होता है ? तब पुत्री ने कहा हाँ माँ ऐसा ही होता है, जब भी हम किसी अपने को मन से याद करते है तो हमारे अपने को हिचकियां आने लगती हैं।

तब कांता बाई ने सोचा कि मैं तो अपने ठाकुर को हर पल याद करती रहती हूँ यानी मेरे लल्ला को भी हिचकियां आती होंगी ??

हाय मेरा छोटा सा लल्ला हिचकियों में कितना बेचैन हो जाता होगा.! नहीं ऐसा नहीं होगा अब से मैं अपने लल्ला को जरा भी परेशान नहीं होने दूंगी और... उसी दिन से कांता बाई ने ठाकुर को याद करना छोड़ दिया।

अपने लल्ला को भी अपनी पुत्री को ही दे दिया सेवा करने के लिए। लेकिन कांता बाई ने एक पल के लिए भी अपने लल्ला को याद नहीं किया.। और ऐसा करते-करते हफ्ते बीत गए और फिर एक दिन...

जब कांता बाई सो रही थी तो साक्षात बांके बिहारी कांता बाई के सपने में आते है और कांता बाई के पैर पकड़ कर ख़ुशी के आंसू रोने लगते हैं.? कांता बाई फौरन जाग जाती है और उठ कर प्रणाम करते हुए रोने लगती है और कहती है कि...

प्रभु आप तो उन को भी नहीं मिल पाते जो समाधि लगाकर निरंतर आपका ध्यान करते रहते हैं। फिर मैं पापिन जिसने आपको याद भी करना छोड़ दिया है आप उसे दर्शन देने कैसे आ गए ??

तब बिहारी जी ने मुस्कुरा कर कहा- माँ, कोई भी मुझे याद करता है तो या तो उसके पीछे किसी वस्तु का स्वार्थ होता है। या फिर कोई साधू ही जब मुझे याद करता है तो उसके पीछे भी उसका मुक्ति पाने का स्वार्थ छिपा होता है।

लेकिन धन्य हो माँ तुम ऐसी पहली भक्त हो जिसने ये सोचकर मुझे याद करना छोड़ दिया कि कहीं मुझे हिचकियां आती होंगी। मेरी इतनी परवाह करने वाली माँ मैंने पहली बार देखी है।

तभी कांता बाई अपने मिटटी के शरीर को छोड़ कर अपने लल्ला में ही लीन हो जाती हैं।

इसलिए बंधुओ वो ठाकुर तुम्हारी भक्ति और चढ़ावे के भी भूखे नहीं हैं, वो तो केवल तुम्हारे प्रेम के भूखे है उनसे प्रेम करना सीखो।




राधा रानी भक्त गुलाब सखी

बरसाने में प्रेम सरोवर के मार्ग पर एक समाधी बनी हुई है। जिसे सब गुलाब सखी के चबूतरे नाम से जानते है।

जिस भक्त का नाम था गुलाब। गुलाब एक गरीब मुस्लमान था। राधा रानी सब पर कृपा करती है। ये बरसाने में श्री जी के मंदिर में सारंगी बजाता था। और जो पैसा मिल जाता था उससे अपना पेट पालता था। इसकी एक बेटी थी जिसका नाम था राधा। जब समाज गायन होता था तो वो लड़की बड़ा भाव विभोर होकर राधा रानी के सामने नृत्य करती थी। जब कन्या बड़ी हुई तो लोगो ने कहना शुरू कर दिया गुलाब अब तो तेरी बेटी जवान हो गई है। अब इसके लिए कोई लड़का देख ना। तो उस भक्त ने कहा की राधा रानी की बेटी है जब वो कृपा करेगी तो शादी हो जाएगी। मेरे पास इतना पैसा नही है की में व्यवस्था कर सकुं। लोगो ने कहा की तुम लड़का तो देखो व्यवस्था हम कर देंगे। तो उस भक्त गुलाब ने एक लड़का देखा और बेटी का विवाह कर दिया।

बेटी चली गई अपनी ससुराल। 3 दिन हो गए पर बेटी को भुला नही पा रहा है। खाना-पीना सब छूट गया। ना सारंगी बजाई, ना समाज गायन में गया लेकिन एक दिन रात्रि को श्री जी के मंदिर के द्वार पर बैठ गया। ठीक रात्रि के 12 बजे उसे एक आवाज सुनाई दी। तभी एक छोटी सी बालिका उसे दौड़ती हुई दिखाई दी और गुलाब सखी के पास आई और बोली की बाबा, बाबा। आज सारंगी नाय बजायेगो?
मैं नाचूंगी।

जब उसने आँख खोल के देखा तो एक सुंदर बालिका खड़ी है। उसने पास रखी सारंगी उठाई और बजाना शुरू कर दिया। वो लड़की नृत्य करते हुए सीढ़ियों की और भागी। गुलाब ने अपनी सारंगी रख दी और राधा राधा कहते हुए उस लड़की की और दौड़ा। लेकिन उसके बाद वो वहां किसी को नही दिखा। श्री जी में समां गया।

लोगो ने सोचा की इसका खाना पीना छूट गया था कहीं ऐसा तो नही की पागल होकर मर गया हो।

लोग भूल गए महीनो निकल गए। लेकिन एक दिन रात्रि में गोस्वामी जी राधा रानी को शयन करवा कर मंदिर की परिक्रमा में आ रहे थे। तो झाड़ी के पीछे से निकला।

पुजारी ने पूछा की कौन है?
वो बोला-तिहारो गुलाब।

पुजारी ने कहा की-गुलाब तो मर गया है।
उसने कहा की मैं मरा नही हूँ श्री जी के परिकर में सम्मिलित हो गया हूँ।

गोस्वामी जी ने पूछा की कैसे?

तो उसी समय गुलाब ने गोस्वामी जी के हाथ में पान की बिरि रखी जो अभी अभी राधा रानी को शयन के समय भोग लगा के आये थे।

इतना कह कर वो झाड़ियों के अंदर चला गया और फिर कभी नही दिखा।
आज भी बरसाने में गुलाब सखी जी की समाधि है। जिसे गुलाब सखी का चबूतरा कहते है।




प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता ह

बरसाने में एक संत किशोरी जी का बहुत भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते राधा रानी के महल में। बड़ी निष्ठा ,बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में उन संत की।

एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को बरसाने मन्दिर में पोशाक अर्पित कर रहे थे 

तो उन महात्मा जी के मन में भाव आया की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया 

और लोग आ रहे है तो कोई फूल चढ़ाता है , कोई भोग लगाता है , कोई पोशाक पहनाता है और मैंने कुछ भी नही दिया, अरे मै कैसा भगत हूँ ।

तो उन महात्मा जी ने उसी दिन निश्चय कर लिया की मै अपने हाथो से बनाकर राधा रानी को सूंदर सी एक पोशाक पहनाऊंगा

ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा जी तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी सुंदर सी एक पोशाक बनाई, 

पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा। कपड़ा लेकर आयें,अपने हाथो से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बनाई।

सूंदर सी पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे।

अब बरसाने की तो सीढिया है काफी ऊची तो वो महात्मा जी उपर चढ़कर जा रहे है तो देखियें कैसे कृपा करती है वो हमारी राधा रानी।

आधी सीढियों तक ही पहुँचें होंगे महात्मा जी की तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा जी को बोलती है की बाबा ये कहा ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ? 

वो महात्मा जी बोले की लाली ये मै किशोरी जी के लिए पोशाक बना के उनको पहनाने के लिए ले जारयो हूँ बृज भाषा में जबाब दिया।

वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहोत सारी पोशाक है तो तू ये मोकू देदे ना 

तो महात्मा जी बोले की बेटी तोकू मै दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जारयो हूँ तोकू ओर दिलवा दूँगो।

लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया 

बाबा ये मोकू देदे पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊंगा ये नहीं दूंगा लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक ले भागी, 

अब महात्मा जी बहुत दुखी हो गए , बूढ़े महात्मा जी अब कहाँ ढूंढे उसको तो वही सीढियो पर बैठकर रोने लगे 

जब कई संत मंदिर से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ? तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर वासे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो क्या करु मै अब ?

वो बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन कर लो।

रोना बन्द हुआ लेकिन मन ख़राब था क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे 

और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी , शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी, ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है।

और अब जाकर अंदर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री जी का दर्शन खुला, पट खुले तो वो महात्मा क्या देख रहें है की 

जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी वो ही पोशाक पहनकर मेरी राधा रानी बैठी हुई है, उसी वस्त्र को धारण करके किशोरी जी बैठी है।

ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले की किशोरी जी मै तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागी आप तो।

किशोरी जी ने कहा की बाबा ये केवल वस्त्र नहीं, ये केवल पोशाक नहीं है या में तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है, भागना ही पड़ता है।

ऐसी है हमारी राधा रानी प्रेम प्रतीमूर्ति, प्रेम की अद्भुत परिभाषा है।।




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