कुछ अमल भी जरुरी है इबादत के बाद...... 

सिर्फ सजदा करने से जन्नत नहीं मिलती !





हमारी क्या मज़ाल कि हम रब को याद करें....

वो तो रब ही है जो हमें कोई गम देकर खुद को याद करवाता है





ज़ुबानी.....इबादत ही काफ़ी नहीं....

ख़ुदा सुन रहा है....खयालात भी...




रे मनवा

रे मनवा.....
तू जाने ले क्या है भक्ति भाव
प्रभु का एक ही स्वभाव
एक ही भाव
रे मनवा.......

कभी न मालूम हो तुझको क्या है आभाव
तूने बनाया है मुझस ऐसा लगाव
में भी चाहूँ तुझमे आये बदलाव
रे मनवा.......

जानले जिन्दगी क्या चाहे तुझसे
लम्बा सफर काल गति तेज है
तू निस्तेज है
रे मनवा.......

जाग अब भी समय है पास
फिर न कहना है जीतेजी कुछ न कर पाया
मिला था सब कुछ पर मै भरमाया
के मनवा.......

जोड़तोड़ की जमा माया
वह भी छोड़ आया
खाली हाथ अकेले चला आया
रे मनवा.......

अहसास हुआ यहाँ आने पर
मैं क्या गलती कर आया
के मनवा......

भक्ति धन परमार्थ से दूर रहा
हो गई तेरी भारी पाप की गठरी
तू ही बता अब क्या करे गिरधारी
रे मनवा......

अब भी तो चेत ले
अपने को बदल ले
रे मनवा तू जान ले ,क्या है भक्ति-भाव




वृदांवन के वृक्ष क्या है

ब्रज के एक संत बाबा ब्रजमोहनदास जी के पास आया करते थे "श्री रामहरिदास जी", उन्हेंनें पूछाँ कि बाबा लोगों के मुहॅ से हमेशा सुनते आए कि🌹🌹🌹

“वृदांवन के वृक्ष को
मर्म ना जाने केाय,
डाल-डाल और पात-पात
श्री राधे राधे होय

तो महाराज क्या वास्तव में ये बात सत्य है.कि वृदावंन का हर वृक्ष राधा-राधा नाम गाता है.

तो ब्रजमोहनदास जी ने कहा - क्या तुम ये सुनना या अनुभव करना चाहते हो ?

तो श्री रामहरिदास जी ने कहा - कि बाबा! कौन नहीं चाहेगा कि साक्षात अनुभव कर ले. और दर्षन भी हो जाए. आपकी कृपा हो जाए,

तो ब्रजमोहन दास जी ने दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी. और कहा - कि मन में संकल्प करो और देखो और सामने "तमाल का वृक्ष" खडा है

उसे देखो, तो रामहरिदास जी ने अपने नेत्र खोले तो क्या देखते है

कि उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों से राधे-राधे लिखा है उस वृक्ष पर लाखों तो पत्ते है. जहाँ जिस पत्ते पर नजर जाती है.

उस पर राधे-राधे लिखा है, और जब पत्ते हिलते तो राधे-राधे की ध्वनि हर पत्ते स्व निकल रही है.

तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और ब्रजमोहन दास जी के चरणों में गिर पडे
और कहा कि बाबा आपकी और राधा जी की कृपा से मैने वृदांवन के वृक्ष का मर्म जान लिया इसको केाई नहीं जान सकता कि वृदांवन के वृक्ष क्या है ?

ये हम अपनेशब्दों में बयान नहीं कर सकते ,ये तो केवल संत ही बता सकता है हम साधारण दृष्टि से देखते है .




जब हनुमान जी का भ्रम टूट गया

हनुमान जी जब संजीवनी बुटी का पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है।
प्रभु आपने मुझे संजीवनी बूटी लेने नहीं भेजा था, बल्कि मेरा भ्रम दूर करने के लिए भेजा था। और आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही आपका राम नाम का जप करने वाला सबसे बड़ा भक्त हूँ।

भगवान बोले-कैसे ?

हनुमान जी बोले - वास्तव में मुझसे भी बड़े भक्त तो भरत जी है, मै जब संजीवनी लेकर लौट रहा था तब मुझे भरत जी ने बाण मारा और मै गिरा, तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैध बुलाया. कितना भरोसा है उन्हें आपके नाम पर, उन्होने कहा कि यदि मन, वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, यदि रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित होकर स्वस्थ हो जाए।
उनके इतना कहते ही मै उठ बैठा ।सच कितना भरोसा है भरत जी को आपके नाम पर।

शिक्षा :-
हम भगवान का नाम तो लेते है पर भरोसा नही करते, भरोसा करते भी है तो अपने पुत्रो एवं धन पर, कि बुढ़ापे में बेटा ही सेवा करेगा, धन ही साथ देगा। उस समय हम भूल जाते है कि जिस भगवान का नाम हम जप रहे है वे है, पर हम भरोसा नहीं करते। बेटा सेवा करे न करे पर भरोसा हम उसी पर करते है.

दूसरी बात प्रभु! 
बाण लगते ही मै गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप उठाये हुए थे और मै अभिमान कर रहा था कि मै उठाये हुए हूँ। मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया।

शिक्षा :-
हमारी भी यही सोच है कि, अपनी गृहस्थी का बोझ को हम ही उठाये हुए है।जबकि सत्य यह है कि हमारे नही रहने पर भी हमारा परिवार चलता ही है।




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