एक छोटी सी ग़ौरकथा

एक बार की बात है - हर वर्ष की तरह गौड़ देश से ग़ौर भक्त नीलाचल पुरी आया करते थे 
इस वर्ष भी सभी भक्त वहाँ पधारे
श्रीमनमहाप्रभु जी ने श्रीजगन्नाथ जी की मंगला आरती मे सभी भक्तों के संग ख़ूब नृत्य गान किया 
श्रीग़ौरचंद्र को उत्कृष्ट भावो का उदय होता के सम्पूर्ण देह कदली की डाल की तरह काँप उठता, मुख से पूर्ण ज ज ज ग ग न न पुरा जगन्नाथ भी नहीं कहा करते
महाभाव रस संकीर्तन श्रीमहाप्रभु जी ने ख़ूब नृत्य किया। श्रीनित्यानंद प्रभु ने श्रीग़ौर को थका हुआ जान विश्राम करने को कहा
श्रीमहाप्रभु ने संकीर्तन बंद करवा दिया और विश्राम को चले गए
श्रीमहाप्रभु जी का एक सेवक था श्रीगोबिंद ( यह श्रीमहाप्रभु जी के गुरु श्रीईश्वरपुरी का शिष्य था) वह सदा श्रीमहाप्रभु जी की सेवा करता था 
वह श्रीमहाप्रभु जी को प्रसाद खिला कर, उनकी सेवा करके ही स्वयं प्रसाद पाता था
श्रीमहाप्रभु अपनी लीला के छह वर्ष श्रीराधा भाव दिव्यनुमाद मे रहते थे तब उस समय वह अपना अधिक से अधिक समय श्रीकाशीमिश्र के घर मे एक छोटा सा कक्ष जहाँ केवल एक व्यक्ति के जाने की जगह थी उस कमरे का नाम गम् Read More






झुका सर भोले के चरणों मे...
वो तेरा दुखडा दूर भगा देंगे... 
जला शिव की ज्योत अपने मन में 
वो तेरा भाग्य जगा देंगे...
हर हर महादेव

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