कौटिल्य विष्णुगुप्त वतस्यांन बन गया

** चाणक्य ***

जब चाणक्य के बाप चणक के सिर को मगध के राजा नंद ने काट कर सूली पर लटका दिया था ,तो उस वक़्त चाणक्य की आयु 6 साल थी । तब उसने क्या किया ? इसे लिखने का प्रयास किया है ।

यह कौन है ,जो लड़ रहा है ।
खंबे के ऊपर चढ़ रहा है ।
नहीं दिखाई दे रही इसको काली रात ।
नहीं दिखती इसको होती बरसात ।
चणक का सिर ढका है ,इस मीनार पर ।
राजा नंद का आदेश है ,इस मीनार पर ।
ना चढ़े इस पर कोई , यह आदेश है मेरा ।
जो उतारे चणक शीश ,प्रबल शत्रु है ।
मेरा अरे 6 साल का यह बालक , फिर भी चढ़ता जाता है ।
राजाज्ञा का विरोध कर फिर भी बढ़ता जाता है ।

पकड़ो - पकड़ो शीश लेकर भाग रहा है ।
जंगल की ओर शीश लेकर भाग रहा है ।
गुम हो गया यह ,अब इसको ढूंढे कहां ?
दूर एक जगह कोटिल्य शपथ खा रहा है ।
नंद का सर्वनाश ही जीवन लक्ष्य है ।
बिस्तर त्यागा , और कच्चा अन्न हीं अब भक्ष्य है ।
रुक तक्षशिला की ओर कर , ज्ञान प्राप्ति जरूरी है ।
लक्ष्य को पाने की खातिर ,ज्ञान बहुत जरूरी है ।

गुरु बन तक्षशिला से , वापस मगध में आऊंगा 
नंद का सर्वनाश कर ,पूरे भारत को बताऊंगा ।
शिष्यों की एक फौज खड़ी करनी है ।
हर राह पुनः सजनी सवरनी है ।
मेरी राह में , जो भी कोई आएगा ।
अमात्य हो या राक्षस ,सब को मिटाऊंगा ।
आंखों में सपने भर , पग-पग चल दिया ।
चणक पुत्र चाणक्य तक्षिला चल दिया ।

अब चाणक्य महान गुरु बन चुका है ।देश दुनिया मे उनका बड़ा नाम है ।और वे विष्णु गुप्त वात्स्यानन के नाम से प्रसिद्ध है । लेकिन जो प्रतिज्ञा उन्होंने बचपन मे ली थी , वो आज भी उनकी आँखों मे किसी लावे की भांति जल रही है ।तब उन्होंने क्या किया ?

कौटिल्य विष्णुगुप्त वतस्यांन बन गया है ।
गुरु परंपरा में महान गुरु बन गया है ।
पर आंखों में अभी भी कुछ अखरता है ।
नंद नाश का सपना आंखों में जलता है ।
एक दिन कदम , मगध की ओर चल दिए 
सपने ने हकीकत का रूप धर लिए ।
चंद्रगुप्त जैसे राह तक रहा था ।
गुरु की राह तक रहा था ।
गुरु शिष्य का मिलन केंद्र मगध था ।
चंद्रगुप्त के हाथ ही नंद का वध था ।

और एक दिन संग्राम घनघोर हुआ ।
हर और चारों ओर हुआ । 
कैसा भयानक गृह युद्ध चाणक्य ने करवाया था ।
नंद का नाश बहुत नजदीक हो आया था ।
गर्दन ,शीश से अलग हो चुकी थी ।
नयी पताका , मगध पर फैल चुकी थी ।
चाणक्य ने आज पका भोजन खाया है ।
शपथ से मुक्त होने का दिन आया है ।
चणक का उसने श्राद्ध कर दिया है ।
एक नया इतिहास लिख दिया है ।

इसके बाद के चाणक्य को हम सब राजनैतिक चाणक्य के रूप में जानते है ।




इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती हैं बलिद

देखो मुल्क मराठों का ये,यहाँ शिवाजी डोला था 
मुग़लों की ताक़त को जिसने तलवारों पर तौला था 
हर पर्वत में आग लगी थी हर पत्थर एक शोला था 
हर हर हर महादेव की बोली बच्चा बच्चा बोला था 
यहाँ रखी थी शिवाजी ने लाज हमारी शान की 
इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती हैं बलिदान की 





मेरी धडकनो में धडकता रहे तु , मेरे देश तुझको नमन है मेरा, जीऊं तो जुबां पर तेरा नाम हो मरूं तो तिरंगा कफन हो मेरा।.





दे सलामी इस तिरंगे को जिससे तेरी शान है . सिर हमेशा ऊँचा रखना इसका जब तक दिल में जान हैं ..





धर कर चरण विजित श्रृंगों पर झंडा वही उड़ाते हैं।
अपनी ही ऊँगली पर जो खंजर की जंग छुड़ाते हैं ।
पड़ी समय से होड़ खींच मत तलवों से कांटे रूककर।
फूंक फूंक चलती न जवानी खतरों से डरकर झुककर।
नींद कहाँ उनकी आँखों में जो धुन के मतवाले हैं ।
गति की तृषा और बढ़ती पड़ते पग में जब छाले हैं।।





" कुछ तो खासियत है, 
               इस प्रजातंत्र में,

वोट देता  हूँ फकीरों को, 
      कमबख्त शहंशाह बन जाते है !! "





इंनसानियत तो मेने ब्लड बैंक में देखी,

ऐ दोस्त

लहू की बोतल पर जाति का लेबल नहीं होता।





लगा दो जाति का Label लहू की बोतल पर भी, 
देखतें हैं... कितनें लोग रक्त लेने से मना करते है





मयखाने में साक़ी से पूछा मैंने कि आजकल इतना सन्नाटा क्यों है...
वो बोला कि साहब लहू का दौर है, आजकल शराब पीता कौन है...!!





मुझे ना तन चाहिए, ना धन चाहिए
बस अमन से भरा यह वतन चाहिए
जब तक जिन्दा रहूं, इस मातृ-भूमि के लिए
और जब मरुँ तो तिरंगा कफ़न चाहिये





जो अब तक ना खौला, वो खून नहीं पानी है,
जो देश के काम ना आये, वो बेकार जवानी है





मैं भारतवर्ष का हरदम अमिट सम्मान करता हूँ
यहाँ की चांदनी मिट्टी का ही गुणगान करता हूँ,
मुझे चिंता नहीं है स्वर्ग जाकर मोक्ष पाने की,
तिरंगा हो कफ़न मेरा, बस यही अरमान रखता हूँ।





क्यों मरते हो बेवफा सनम के लिए….
एक कद जगह भी नहीं मिलेंगे दफ़न के लिए…
मरना है तो हिन्द ये वतन के लिए मरो
हसीना भी दुपट्टा उतार देगी तुम्हारे कफ़न के लिए





नादान थे तो दोस्त थे.
     जवान हुए तो 
     हिन्दू-मुस्लिम 
        बन गए.
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      - गुलज़ार





ना मस्जिद की बात हो , न शिवालों की बात हो ,
प्रजा बेरोज़गार है , पहले निवालों की बात हो !!
मेरी नींद को दिक्कत ना भजन से है, ना अज़ान से है,
दिक्कत मरते हुये जवान और खुदकुशी करते किसान से है..!!





हम बचाते रह गए
दीमक से अपना घर!

कुर्सियों के चन्द कीड़े
सारा मुल्क खा गए!!





सख्ती थोड़ी लाज़िम है पर पत्थर होना ठीक नही,
हिन्दू मुस्लिम ठीक है साहब पर कट्टर होना ठीक नहीं ।।





हाकिमे वक़्त ने ये कैसा हिंदोस्तान कर दिया, 
बेजान इमारतों को भी हिन्दू-मुसलमान कर दिया...




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