परिस्थिति आदमी को परदेशी बना देता है!
वर्ना अपनी गली में जीना कौन नहीं चाहता है!




मानव जीवन का उद्देश्य

मानव जीवन के मूल उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने वाला लेख है | लेख में प्रकाश डाला गया है कि जब मानव शरीर लेकर आये हैं , तो हमारी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए |

क्या हमने एकांत में बैठकर कभी यह सोचा है या सोचने का प्रयास भी किया है की मानव जन्म हमें क्यों मिला है | चोरासी लाख योनियों में भ्रमण करते हुए और इस लम्बी यात्रा में जलचर, नभचर, थलचर और वनस्पति बनने के बाद हमें मानव जीवन मिला है | मानव जीवनरूपी यह अदभुत मौका परम कृपालु और परम दयालु परमपिता ने हम पर कृपा और दया करके हमें प्रदान किया है | मानव जीवनरूपी यह मौका इसलिए अदभुत है क्योंकि चोरासी लाख योनियों के चक्रव्यहू से सदा सदा के लिए छुटने का / मुक्त होने का यह एकमात्र साधन है |
पर क्या हमारा प्रयास इस उद्देश्य पूर्ति हेतु हो रहा है या हम व्यर्थ की दुनियादारी में ही उलझे पड़े हैं | हमें समझाना होगा की श्रेष्ठत्तम मार्ग यह है की बहुत साधारण दुनियादारी रखते हुए मानव जीवन के उद्देश्य पूर्ति के लिए प्रयास करना |
अब साधारण दुनियादारी का अर्थ समझाना चाहिये | साधारण दुनियादारी का अर्थ है की सबसे समभाव / सामंजस्य रखते हुए जहाँ जरुरत नहीं हो वहां व्यर्थ के पचड़े में नहीं पड़ना | जहाँ जरूरत हो वहाँ बहुत संक्षिप्त दुनियादारी रखना | क्योंकि यह संक्षिप्त दुनियादारी उस बड़ी दुनियादारी से बहुत अच्छी है जिसे रखने में इतना समय, आयु और श्रम व्यर्थ हो जाता है की हमारे मानव जीवनरुपी उद्देश्य पूर्ति हेतु हमारे पास समय, आयु और श्रमशक्ति बचती ही नहीं और इस तरह हम मानव जीवनरूपी एक सुनहरा अवसर व्यर्थ ही गवा देते हैं |

मानव जीवन की उद्देश्य पूर्ति हेतु सर्वोत्तम साधन प्रभु-भक्ति है | भक्तिमार्ग मानव जीवन को सफल करने का, मानव जीवन की उद्देश्य पूर्ति का, चौरासी लाख योनियों के चक्रव्यहू से छुटने का और परमानन्द ( "सांसारिक सुख" से बहुत ऊंचा "आनंद" और उससे भी बहुत बहुत ऊंचा "परमानन्द" ) पाने का श्रेष्ठत्तम मार्ग है |
पर मानव का दुर्भाग्य देखें की दुनियादारी में पड़ "सांसारिक सुख" को सब कुछ मान उसी में लिप्त रहने में अपना सौभाग्य एवं अपने मानव जीवन की सफलता समझ बैठा है | यहाँ पर दो कहावते बहुत सटीक बैठती हैं |
पहली कहावत - " तालाब के मेंढक " को नदी और महासागर की भव्यता का पता ही नहीं और वह तालाब को ही सबकुछ मान बैठा है | हमने भी दुनियादारी और सांसारिक सुख के तालाब को ही सबकुछ मान लिया है | हम अभी भी "भक्तिरूपी नदी" जिसका विलय "प्रभुरुपी महासागर" में होता है , उससे अनभिज्ञ हैं |
दूसरी कहावत - अगर हमने आम खाया ही नहीं तो हम आम के स्वाद को कभी समझ ही नहीं पायेगे क्योंकि खाने से ही वह स्वाद समझ में आता है | किसी के समझाने से आम की मिठास कभी समझ में नहीं आती अपितु स्वम के अनुभव से ही आती है | ऐसे ही प्रभु भक्ति में गोता लगाने पर " आनंद " का आभास और फिर भक्ति में तीव्रता आने पर " परमानन्द " का परम आभास को स्वयं अनुभव करके ही जाना जा सकता है |
इसलिये हमें दुनियादारी करते हुए और सांसारिक सुख भोगते हुए " तालाब के मेंढक " बनकर नहीं रहना चाहिये अपितु हमें भक्तिमार्ग द्वारा आनंद और परमानन्द की सुखद अनुभूति प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होना चाहिये |
यही " प्रभु साक्षात्कार " की और ले जाने वाला मार्ग है | यही चेतन तत्व ( जीव ) का चेतन ( पूर्ण ) में विलय का मार्ग भी है | और सबसे अहम् बात की यही मानव जीवन के उद्देश्य पूर्ति का भी मार्ग है,




एक छोटी सी ग़ौरकथा

एक बार की बात है - हर वर्ष की तरह गौड़ देश से ग़ौर भक्त नीलाचल पुरी आया करते थे 
इस वर्ष भी सभी भक्त वहाँ पधारे
श्रीमनमहाप्रभु जी ने श्रीजगन्नाथ जी की मंगला आरती मे सभी भक्तों के संग ख़ूब नृत्य गान किया 
श्रीग़ौरचंद्र को उत्कृष्ट भावो का उदय होता के सम्पूर्ण देह कदली की डाल की तरह काँप उठता, मुख से पूर्ण ज ज ज ग ग न न पुरा जगन्नाथ भी नहीं कहा करते
महाभाव रस संकीर्तन श्रीमहाप्रभु जी ने ख़ूब नृत्य किया। श्रीनित्यानंद प्रभु ने श्रीग़ौर को थका हुआ जान विश्राम करने को कहा
श्रीमहाप्रभु ने संकीर्तन बंद करवा दिया और विश्राम को चले गए
श्रीमहाप्रभु जी का एक सेवक था श्रीगोबिंद ( यह श्रीमहाप्रभु जी के गुरु श्रीईश्वरपुरी का शिष्य था) वह सदा श्रीमहाप्रभु जी की सेवा करता था 
वह श्रीमहाप्रभु जी को प्रसाद खिला कर, उनकी सेवा करके ही स्वयं प्रसाद पाता था
श्रीमहाप्रभु अपनी लीला के छह वर्ष श्रीराधा भाव दिव्यनुमाद मे रहते थे तब उस समय वह अपना अधिक से अधिक समय श्रीकाशीमिश्र के घर मे एक छोटा सा कक्ष जहाँ केवल एक व्यक्ति के जाने की जगह थी उस कमरे का नाम गम्भीरा था वहाँ महाप्रभुजी रहा करते थे राधा विरह भाव में
उस दिन जब श्रीमहाप्रभु जी संकीर्तन से श्रमित होकर गम्भीरा मे जाकर अपना शीश तो द्वार पर रख दिया और अपने चरण कमल कमरे के भीतर रख दिए 
वह गम्भीरा छोटा होने से कमरे में कोई जा नहीं सकता था और महाप्रभु जी का शीश द्वार पर था
हर दिन की सेवा नियम के अनुसार श्रीगोविंद प्रभु के गम्भीरा मे प्रवेश करने लगा परंतु प्रभु का शीश द्वार पर होने से गोविंद प्रवेश नहीं कर सका
गोविंद प्रभु से बोला " प्रभु! आप हमें अंदर आने का स्थान दीजिए हम अंदर कैसे आए? 
आपकी सेवा करनी है
प्रभु बोले- गोविंद! मेरे मे हिम्मत नहीं मै बहुत थका हुआ है। तु स्वयं ही अंदर आ जा 
मै नहीं हिल सकता
गोविंद ने कहा प्रभु मै कैसे अंदर आऊँ
प्रभु बोले मुझे नहीं पता आना है तो आओ नहीं तो मत आओ
गोविंद दुखी हुआ - प्रभु की सेवा का नियम कैसे तोड़ सकता हुँ
चाहे अपराध हो जाए पर प्रभु की सेवा नहीं छोड़ सकता
तभी गोविंद अपराध आदी का विचार ना करते हुए श्रीमहाप्रभु जी के मुख पर कपड़ा रख कर ताकी गोविंद के चरण की धूल नहीं पड़े महाप्रभु जी पर ऐसा करते हुए गोबिंद प्रभु के शीश से लाँघते हुए अपना पैर उठा कर गम्भीरा कक्ष मे आ गया
और गम्भीरा मे आकर प्रभु के चरणों की सेवा करने लगा, कई घंटो तक चरण सेवा करता रहा श्रीमहाप्रभु जी को आँख भी लग गयी 
फिर महाप्रभु जी उठे और देखा गोविंद अभी भी चरण दबा रहा है
प्रभु बोले- गोविंद तेरा तो नियम है सदा के मेरी सेवा करके जब मै सो जाता हुँ तब तु भी प्रसाद पाकर सो जाता है
प्रभु क्रोध में बोले- "अभी तक तूने प्रसाद क्यूँ नही पाया" जाकर क्यूँ नहीं सोया
गोविंद बोला- रोते हुए बोला, प्रभु! आपके शीश के ऊपर लाँघने का अपराध तो मैंने किया आपकी सेवा के लिए चाहे इसके लिए कितने वर्षों ही मुझे नरक जाना पड़े परंतु अब अपने " भोजन सुख" के लिए फिर आपको लाँघ कर बाहर जाऊँ यह मेरा सामर्थ्य नहीं 
मै अपने सुख के लिए कोई काम नहीं कर सकता आपका सुख मेरा सुख है
भोजन करने का सुख और आपको लाँघू ऐसा मै कभी नहीं कर सकता

सम्पूर्ण जीवन भूखा रहूँगा परंतु आपको लाँघ कर कभी भोजन को देखूँगा तक नहीं।





झुका सर भोले के चरणों मे...
वो तेरा दुखडा दूर भगा देंगे... 
जला शिव की ज्योत अपने मन में 
वो तेरा भाग्य जगा देंगे...
हर हर महादेव




बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर

एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे ।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे । कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि 'कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।'
तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी - 'क्यूँ रे, कुम्भार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?'
कुम्भार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।' श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं ।
अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं - 'कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।'
कुम्भार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।'
भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।'
कुम्भार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।'
प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।'
अब कुम्भार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।'
भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?'
कुम्भार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।'
भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।'
प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।'
तब कुम्भार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।'
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया ।
फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया । अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये ।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे ।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते ।





प्यार का मकान है तेरे हाथ में,
कभी आराम तो कभी तूफ़ान है तेरे हाथ में,
राधा का हाथ देख कर कहा था ज्योतिष ने,
तु भले ही गोरी है लेकिन एक "श्याम" है तेरे हाथ में!!!




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