धर कर चरण विजित श्रृंगों पर झंडा वही उड़ाते हैं।
अपनी ही ऊँगली पर जो खंजर की जंग छुड़ाते हैं ।
पड़ी समय से होड़ खींच मत तलवों से कांटे रूककर।
फूंक फूंक चलती न जवानी खतरों से डरकर झुककर।
नींद कहाँ उनकी आँखों में जो धुन के मतवाले हैं ।
गति की तृषा और बढ़ती पड़ते पग में जब छाले हैं।।