MDH मसाला की सफलता की कहानी

जन्म
Mahashay Dharampal Gulati ‘महाशय धरमपाल गुलाटी’ का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में एक सामान्य परिवार में हुआ था. उनके पिता महाशय चुन्नीलाल और माता चनन देवी दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे. वे दोनों आर्य समाज के अनुयायी थे. धरमपाल का बचपन सियालकोट में बीता, जहाँ उनके पिता की मिर्च-मसालों की दुकान थी, जिसका नाम था – ‘महाशियान दि हट्टी’. उनके पिता अपने बनाये मिर्च-मसालों के कारण उस क्षेत्र में ‘दिग्गी मिर्च वाले’ के नाम से जाने जाते थे.

प्रारंभिक जीवन व शिक्षा
धरमपाल का मन कभी भी पढ़ाई-लिखाई में  नहीं लगा. 5 वीं कक्षा में फेल होने के बाद तो उन्होंने पढ़ाई से नाता ही तोड़ लिया और स्कूल छोड़ घर पर बैठ गए. अपने पुत्र के इस तरह पढ़ाई छोड़ देने से उनके पिता पहले तो दुखी हुए. लेकिन बाद में उन्होंने उन्हें  कोई कारीगरी या हुनर सिखाने की ठानी ताकि वे  कम से कम अपने पैरों पर खड़े होने लायक बन सके.

सबसे पहले उनके पिता ने उन्हें लकड़ी का काम सीखने एक बढ़ई के पास भेजा. 8 माह तक वहाँ लकड़ी का काम सीखने के बाद धरमपाल ने वहाँ जाना बंद कर दिया. उनका मन उस काम में नही रमता था.  फिर उनके पिता ने उन्हें एक चांवल की फैक्ट्री में काम पर लगा दिया, उसके बाद कपड़ों की. 15 वर्ष की आयु तक आते-आते धरमपाल कपड़ों से लेकर हार्डवेयर तक कई काम करके छोड़ चुके थे. किसी भी काम में वे टिक नहीं पाए. आखिरकार, उनके पिता ने उन्हें अपनी ही दुकान पर बैठा दिया और वे वहाँ मिर्च-मसाले पीसने का काम सीखने लगे. 18 वर्ष के होते ही उनके पिता ने उनकी शादी करवा दी और इस तरह अपनी तरफ से धर्मपाल के प्रति हर जिम्मेदारी पूर्ण कर ली. इधर धर्मपाल भी मिर्च मसाले का कारोबार आगे बढ़ाने में लग गए.

देश विभाजन का धरमपाल के जीवन पर प्रभाव
सब कुछ सही रीति से चल रहा था कि 1947 में देश का विभाजन हो गया और सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. देश विभाजन के उपरांत पाकिस्तान में दंगे भड़क उठे, जिनमें कई हिन्दुओं को जान से मार दिया गया, कई की दुकानें लूट ली गई और उन पर अनेकों अत्याचार किये गए. ऐसी स्थिति में वहाँ रह रहे हिन्दुओं में असुरक्षा की भावना घर कर गई और उन्हें रातों-रात पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा. धर्मपाल भी सियालकोट छोड़कर भारत आने के लिए निकल गए. जिस ट्रेन से वे भारत आ रहे थे, उसमें लाशें ही लाशें बिछी थी. लेकिन जैसे-तैसे वे अमृतसर पहुँच ही गए. वहाँ एक दिन रुकने के बाद दूसरे दिन ट्रेन पकड़कर वे दिल्ली के करोलबाग अपनी बहन के घर आ गए.

तांगा वाले से ‘Masala King’ मसालों के बादशाह बनाने की कहानी
दिल्ली आने के बाद धरमपाल को फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी. वे सियालकोट से जेब में 1500 रुपये लेकर चले थे. वही उनकी जमा-पूंजी थी. उसमें से 650 रुपये का उन्होंने एक तांगा और घोड़ा खरीद लिया और तांगा वाला बन गए. वे न्यू दिल्ली स्टेशन से क़ुतुब रोड और करोल बाग़ से लेकर बड़ा हिंदू राव तक तांगा चलाते थे. लेकिन अधिक समय तक वे यह काम नहीं कर पाए. आखिर थे तो वे व्यापारी ही. दो महीने तांगा चलाने के बाद उन्होंने तांगा बेच दिया और प्राप्त पैसों से लकड़ी का खोका खरीद कर अजमल खान रोड, करोल बाग़ में एक छोटी सी दुकान बनवा ली. उसी दुकान में उन्होंने मसालों का अपना पुश्तैनी धंधा फिर से शुरू कर लिया. अपनी इस दुकान का नाम उन्होंने “महशिआन दि हट्टी – सियालकोट वाले” रखा.

कभी सियालकोट में अच्छी खासी दुकान चलाने वाले धर्मपाल उस छोटे से खोके पर ही पूरी मेहनत से मसाला कूटने और मिर्च पीसने का कार्य करने लगे. धीरे धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी. जैसे-जैसे लोगों को पता चलता गया कि ये वही सियालकोट के दिग्गी मिर्च वाले है, वे उनकी दुकान पर मसाले खरीदने आने लगे. साथ ही उनके बनाए मसालों की Quality भी इतनी अच्छी थी कि लोगों का उन पर भरोसा बढ़ता गया. अखबारों में दिए गए विज्ञापनों से भी उनके बनाये मसाले मशहूर होने लगे और उनका व्यापार बढ़ता चला गया.

1968 तक उन्होंने दिल्ली में अपनी मसालों की फैक्ट्री खोल ली. उसके बाद उनके मसाले पूरे भारत में और बाहर के देशों में export होने लगे. आज उनका “महशिआन दि हट्टी” MDH एक बहुत बड़ा ब्रांड है. वे MDH के प्रबंध निदेशक और brand ambassador है. MDH विश्व के 100 से अधिक देशों में अपने 60 से अधिक product की supply करता है. उनके Top 3 Product है – देग्गी मिर्च, चाट मसाला और चना मसाला. वर्ष 2016 में उनकी कंपनी का total revenue 924 करोड़ रूपये था.

कभी दो आना लेकर तांगा चलाने वाले महाशय धरमपाल आज अरबपति है. उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और कार्य के प्रति पूर्ण ईमानदारी से आज यह मुकाम हासिल किया है. एक उद्योगपति होने के साथ-साथ वे एक समाजसेवी भी है. उन्होंने समाज सेवा के उद्देश्य से कई अस्पताल और स्कूलों का निर्माण करवाया. मसाला किंग के नाम से जाने जाने वाले महाशय धरमपाल ने अपने जीवन का एक फलसफ़ा बनाकर रखा है – “दुनिया को अपने सर्वश्रेष्ठ दो और सर्वश्रेष्ठ स्वमेव ही आपके पास वापस आएगा.”


 

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