अर्जुन का प्यार

ये कथा द्वापरयुग की है , जब भगवान श्री कृष्ण धरती पर अवतार लेकर लीला कर रहे थे , और उस समय द्वारिका के राजा थे।भगवान भोलेनाथ श्री कृष्ण लीला का दर्शन करते हुए ,एक दिन कैलाश पर ध्यान मग्न बैठे थे ।मन ही मन भक्तों की महानता के विषय में सोंच रहे थे। कृष्णभक्त  अर्जुन के विचार में डूबे हुए मन ही मन मुस्कुरा रहे थे । इतने में माँ पार्वती प्रभु के पास आई और पूछने लगी , प्रभु आप किन विचारों में खोए हुए मुस्कुरा रहे हैं । ऐसी क्या बात है , मुझे भी बताइये , मैं भी जानना चाहती हूँ ।भोलेनाथ ने कहा, मैं भक्त के गुणों के विषय में विचार कर रहा था, और उनके प्रेम में मग्न हो गया।आप कब आईं मुझे पता ही नहीं चला । पार्वती माता ने कहा ,प्रभु मुझे भी ऐसे भक्त के बारे में बताइये ? मैं भी उनके बारे में जानना चाहती हूँ।और जब भोलेनाथ ने कृष्णभक्त अर्जुन के बारे में बताया तब माता ने कहा, मैं उनके दर्शन करना चाहती हूँ।

      भोलेनाथ माता को साथ लेकर प्रभु श्री कृष्ण भक्त अर्जुन से मिलने चले। जब महादेव और माता हस्तिनापुर पहुँचे  , तो उन्हें पता चला कि अर्जुन द्वारिका श्री कृष्ण से मिलने गये हैं।महादेव माता को लेकर द्वारिका पहुँचे और श्री कृष्ण से कहा , महादेवी आपके प्रिय भक्त अर्जुन के दर्शन की इच्छा लेकर आई हैं ।श्री कृष्ण भगवान ने कहा ,  अवश्य , आप दोनो यहाँ आराम से विराजें, अभी मैं अर्जुन को लेकर आता हूँ और आपके दर्शन की इच्छा पूरी करवाता हूँ।

                                         श्री कृष्ण जब अर्जुन के कक्ष में गये, तो वहाँ का दृश्य देखकर भाव विभोर हो गये। सोते हुए अर्जुन के रोम रोम से श्री कृष्ण श्री कृष्ण का मधुर स्वर निकल रहा था।अर्जुन की ऐसी अवस्था देखकर श्री कृष्ण , महादेव के पास जाना भूल गए,और अर्जुन की भक्ति में खो गए।और धीरे धीरे अर्जुन के पैर प्यार से दबाने लगे ।भोजन के लिए माता रुक्मणी जब बुलाने आई ,तो प्रभु तथा अर्जुन के प्रेम को देखकर रुक्मणी माता भी वही बैठ गई और धीरे धीरे पंखा झलने लगी ।भोजन की सुधि ही माता को नहीं रहा।

                  भोलेनाथ को विलम्ब का कारण समझ में नहीं आया। मन ही मन में महादेव ने ब्रह्मदेव का स्मरण किया।यथाशीध्र ब्रह्मदेव भी वहाँ पहुँच गए।महादेव ने कहा ,जाकर विलम्ब का कारण पता लगाइये ।परन्तु ब्रह्मा जी भी जब सूचना लेकर वापस नहीं आए, तो महादेव को अब चिन्ता होने लगी।नारद महादेव को चिंतित देखकर , वहाँ पधारे।नारद जी को देखकर भोलेनाथ को लगा ,अब काम यथाशीघ्र होगा।नारद जी भी वहाँ जो कुछ हो रहा था,पता लगाने अन्दर गए।वहाँ का दृश्य देखकर नारद जी वहीं कीर्तन करने लगे।कीर्तन की धुन सुनकर महादेव और पार्वती माता भीअन्दर खीचे चले आए। और वहाँ का आनन्दमय दृश्य देखकर महादेवजी भी डमरू बजाकर नृत्य करने से अपने को रोक नहीं पाए।नृत्य तथा कीर्तन की धुन से अर्जुन की नींद खुल गइ।अर्जुन को लगा कि कोई उत्सव हो रहा है।अर्जुन , वहाँ सभी देवताओं को देखकर पूछने लगे यहाँ किसी का उत्सव है? नारदजी ने कहा ,जिसका रोम रोम श्री कृष्ण नाम का कीर्तन करे, यहाँ, उसी का उत्सव है।माता पार्वती यह दृश्य देखकर आनंद विभोर हो गई।अर्जुन की श्री कृष्ण भक्ति देखकर सभी देवता अानंदित हो गदगद मन से अपने-अपने लोक में प्रस्थान किए।

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